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जब इंसान की जरूरत बदल जाती है तो उसका आपसे बात करने का तरीका भी बदल जाता है।
शब्द ही इंसान का आइना होते हैं, शक्ल तो उम्र और समय के साथ बदल
जब इंसान अन्दर से टूटता है तो बहार से खामोश हो जाता है।
मैंने 'भगवान ' तो नहीं देखा फिर भी ' माँ ' के रूप मे उसका रूप देखा। मैनै ' जन्नत ' तो नहीं देखी फिर भी ' माँ ' के प्यार मे उसका ' दृश्य ' देखा
"अपेक्षा" और "उपेक्षा" दोनों का होना ही गलत है "अपेक्षा" खुद को घायल करती है "उपेक्षा" दूसरों को।
इंसान एक ऐसा ग़ाफिल मंसूबा साज़ है कि वह अपनी सारी जिंदगी की प्लानिंग में कभी अपनी मौत को शामिल ही नहीं
अगर आप के पास ऐसा कोई है जो आप को दुःख मे नहीं देख सकता। तो आप ये सुनिश्चित अवश्य करे की उन्हें आप के वजह से दुःख कभी ना हो।
मैदान से हारा हुआ इंसान तो फिर से जीत सकता है, लेकिन मन से हारा हुआ इंसान कभी नहीं जीत सकता इसलिए मन से कभी हार मत मानना।
जब इंसान तन्हा चलना सीख जाता है तब वो दुनिया को समझ चुका
सामने हो मंजिल तो रास्ते ना मोड़ना जो भी हो मन में वह सपने मत तोड़ना। कदम कदम पर मिलेंगी मुश्किले आपको बस सितारे चुनने के लिए जमीन मत छोड़ना॥