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दर्द की दवा न हो, तो दर्द को ही दवा समझ लेना चाहिए…

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हम सभी को दो में से एक दर्द से पीड़ित होना चाहिए अनुशासन का दर्द या पछतावे का दर्द। अंतर यह है कि अनुशासन का वज़न ज़्यादा होता है जबकि अफसोस का वज़न बहुत ज़्यादा होता है।
जब ‘दर्द’ और ‘कड़वी’ बोली दोनों मीठी लगने लगे तब समझ लीजिये कि जीना आ गया
ना कोई तरंग है, ना कोई उमंग है, मेरी ज़िन्दगी भी क्या एक कटी पतंग है
दर्द तब और भी गहरा होता है जब, हमें अपने ही लोगो से धोखा मिलता है
दर्द कम नहीं हुआ है मेरा ! बस सहने की आदत हो गयी है !!
दुःख तुमने मुझे नहीं दिया है, मैंने अपने आप को दुःख दिया है.
हम आने वाले ग़म को खिंचतान कर आज की ख़ुशी पे ले आते है, और उस ख़ुशी में ज़हर घोल देते है… – आनंद
मेरी जिंदगी एक बंद किताब है, जिसे आज तक किसी ने खोला नहीं, जिसने खोला उसने पढा नही, जिसने पढा उसने समझा नही, और जो समझ सका वो मिला नहीं।
समझ नहीं आता किस पर भरोसा करू,
दर्द की दवा न हो तो दर्द को ही दवा समझ